ओढ़कर वसन-ए-इश्क
ओढ़कर वसन-ए-इश्क, दिल-ए-नादां दीदार चाहे। चाहे दिल इश्तिहार-ए-मोहब्बत, मगर साजन इन्तज़ार चाहे।
ओढ़कर वसन-ए-इश्क, दिल-ए-नादां दीदार चाहे। चाहे दिल इश्तिहार-ए-मोहब्बत, मगर साजन इन्तज़ार चाहे।
क्यों दिल उनसे चाहे हज़ार बातें, क्यों निगाहें उन्हें ढूंढे आते जाते। क्यों आजकल दिन कटे राहें तकते, क्यों आजकल गिन गिन कटे रातें।
हम हैं जमीं पर वो है आसमानों में उनकी सी निगाहें देखी नहीं ज़मानों में कभी आओ महफिल में इन्हें सजाकर देखो इन्हें हमारी निगाहों से मिलाकर निगाहें म…
हमारी बातों में उनका गौर नजर आए पर उनके दिल में कुछ और नजर आए। यूँ तो ज़माने में ना उनसा कोइ, पर पूनम की रात में बतौर नजर आए। फ़ूलों से सजी हुई कभी…