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दीदार हुआ था निगाहों से जिन निगाहों का 

जिंदगी को उन निगाहों ने फ़साना बना दिया। 


जिस दिल का कोई अपना ठिकाना ना  था 

उस दिल को किसी ने ठिकाना बना दिया। 


दोस्त अक्सर बैठते मयखानों की महफ़िलों में 

हमने उनकी निगाहों को मयखाना बना दिया। 


न जाने किस लिए महबूब बरहम हैं हमसे

हमने शायद खुद से बरहम ज़माना बना दिया। 


वो जो तसव्वुर में मशरूफ थे शब-ए-तारीक

कलाम-ए-शफ़त ने उसे बेगाना बना दिया। 


आज दिल का महबूब से मिलने का दिल हुआ

महबूब ने ना मिलने का बेबाक बहाना बना दिया। 

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